मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 21 July 2017

राष्ट्रपति और राजनीति

                                                       निर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के जीतने पर एक बार फिर से उनके दलित्त होने को मुखर रूप से समाचारों में रेखांकित किया जा रहा है जबकि उनके जीत जाने के बाद इस तरह की बातें किये जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी. निश्चित तौर पर अपने प्रत्याशी को जिताने लायक संख्या होने पर कोई भी सरकार या पीएम अपनी पसंद के कम समस्या पैदा करने वाले व्यक्ति को ही राष्ट्रपति पद पर देखने के आकांक्षी होते हैं और साथ ही देश के राजनैतिक पटल पर भी अपने समीकरणों को साधने की कोशिशें करते हुए देखे जाते हैं तो ऐसी स्थिति में पीएम मोदी और भाजपा की तरफ से यदि ऐसा किया गया तो कोई बड़ी बात नहीं है. वैसे भी पीएम मोदी के बारे में कहा जाता है कि उन्हें असहमति के शब्द अच्छे नहीं लगते हैं तो आज किसी को भी इस पद तक पहुँचाने की स्थिति में मज़बूत पीएम मोदी ने भी देश के सर्वोच्च पद के लिए कोविंद का चुनाव करके एक तरह से अपनी स्थिति को और मज़बूत ही किया है. सरकार किस व्यक्ति को इस पद पर देखना चाहती है यह उसकी मर्ज़ी है और उस पर सवाल लगाने का कोई मतलब भी नहीं बनता है पर दलित होने के साथ विवादों से दूर रहना कोविंद के लिए उस समय बहुत काम आया जब पीएम मोदी उनके जैसे व्यक्ति को खोज रहे थे.
                                     देश में राष्ट्रपति पद पर बैठे राजनैतिक व्यक्तित्वों में से कई लोगों ने तो अपने पद के साथ पूरी तरह से न्याय किया वहीं कई लोगों की तरफ से केवल सरकार के रबर स्टैम्प की भूमिका ही निभाई गयी. एक समय इंदिरा गाँधी कि हाँ में हाँ मिलाने वाले ज्ञानी जैल सिंह ने भी राजीव गाँधी की मज़बूत सरकार के लिए परेशानी भरे पल पैदा कर देने में कोई कस्र नहीं छोड़ी थी. देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन ने भी जिस तरह से इस पद की गरिमा को बचाये रखने के लिए लगातार कोशिशें की थीं वे अपने आप में एक उदाहरण हैं और आज कोविंद से उस तरह एक आचरण की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है. आम तौर पर पार्टी में सक्रिय नेताओं को जीवन के अंतिम चरण में राष्ट्रपति बनाकर पुरुस्कार देने की परंपरा सी चलती आयी है पर इस मामले में सबसे चौंकाने वाला निर्णय कमज़ोर कहे जाने वाले पीएम मनमोहन सिंह की तरफ से उठाया गया था जब वे राजनैतिक स्तर पर संसद से सड़क तक घिरे हुए थे तो भी उन्होंने अपनी सरकार में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले और विभिन्न विपरीत परिस्थितियों में उनकी सरकार को संकट से उबारने वाले लम्बे राजनैतिक जीवन के अनुभवी प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए आगे किया था.
                                प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल अपने आप में बहुत अच्छा कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने देश में पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ बनने वाली भाजपा की सरकार और पीएम मोदी के साथ तीन वर्षों से भी अधिक समय तक काम किया और कहीं से भी सरकार या विपक्ष के साथ किसी भी तरह के अनुचित व्यवहार या पक्ष का पोषण नहीं किया. बिहार के राज्यपाल के रूप में कोविंद का कार्यकाल भी बहुत अच्छा रहा तभी जेडीयू ने विपक्ष से अलग चलते हुए उनके लिए वोट करने के बारे में सोचा था. कोविंद से भी पूरा देश निष्पक्ष रूप से अपनी राय रखने और सरकार के साथ विपक्ष और देश के मौजूदा हालातों पर नज़र रखने की अपेक्षा ही रखता है. मज़बूत पीएम मोदी अपने गुरु आडवाणी या सुषमा स्वराज जैसे राजनैतिक रूप से बेहद मुखर नेता को इस पद तक पहुँचाने का वो साहस नहीं दिखा पाए जो पीएम के रूप में मनमोहन सिंह ने अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगी को यहाँ पहुंचाकर किया था. वैसे तो राष्ट्रपति के लिए करने को कुछ ख़ास नहीं होता है फिर भी कोविंद से देश यह आशा तो कर ही सकता है कि अब वे भी केवल संघ, भाजपा या मोदी के पीएम के स्थान पर पूरे देश के राष्ट्रपति बनकर उसी तरह का आचरण दिखाएंगें जैसा उनके पूर्ववर्ती प्रणब मुखर्जी द्वारा दिखाया गया है.   
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Tuesday, 18 July 2017

नेता, अधिकारी और शासन

                                          देश के हर राज्य से कभी न कभी इस तरह की ख़बरें सामने आती ही रहती हैं कि किसी अधिकारी ने किसी राजनैतिक दबाव की परवाह न करते हुए केवल कानून की परवाह की और किसी भी स्तर के नेता से जुड़े मसले पर केवल कानून सम्मत कोशिशें ही की हों. ईमानदारी अधिकारियों के दंडात्मक तबादलों में देश के हर राज्य और हर राजनैतिक दल का रिकॉर्ड लगभग एक जैसा ही है इसलिए यह बहस करना ही बेमानी है कि इस समस्या से आखिर किस तरह से निपटा जा सकता है ? आज जिस तरह से आम लोगों का रुझान सरकार और उसके कामों की तरफ बढ़ता ही जा रहा है उस परिस्थिति में किसी भी नेता या सरकार की हरकत को छिपाना बहुत ही मुश्किल काम हो गया है फिर भी नेता पूरी बेशर्मी के साथ अपने काम को करने में नहीं हिचकते हैं. कहने के लिए तो पूरे देश में कानून का राज है पर इस ग़लतफ़हमी को पालने वाले अधिकांश अधिकारी किस तरह से लगभग हर दल की सरकार में केवल धक्के ही खा रहे हैं यह किसी से भी छिपा नहीं है फिर भी केंद्र सरकार ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम करने वाले अधिकारियों को हर वर्ष विभिन्न तरह के सम्मान देने की अपने खोखली प्रक्रिया को जारी रखे हुए है.
                            ताज़ा मामले में शशिकला को जेल में दी जा रही विशेष सुविधाओं से जुड़े खुलासे के बाद कर्णाटक सरकार ने जिस तरह से डी रूपा का स्थानांतरण किया वह अपने आप में नेताओं की उस मानसिकता को ही दर्शाता है जो हर परिस्थिति में अधिकारियों को दबा कर रखने में ही विश्वास किया करते हैं. कहने के लिए यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के अंतर्गत ही आता है पर इसके पीछे कितनी राजनीति छिपी होती है यह सभी जानते हैं. वैसे भी जेल में बंदी नेताओं और उनके समर्थकों को लेकर भारत भर में कानून की लगभग हर समय धज्जियाँ ही उड़ाई जाती रहती हैं पर किसी ईमानदार अधिकारी के चलते कई बार इसका खुलासा भी हो जाता है. परिस्थिति तब और गंभीर और चिंताजनक हो जाती है जब किरण बेदी जैसी अधिकारी भी सुविधा के अनुसार मामलों पर प्रतिक्रिया देने का काम करने लगती हैं. अभी कुछ समय पहले यूपी में कई अधिकारियों और भाजपा नेताओं के बीच भी इसी तरह की ख़बरें आयी थीं तब बेदी ने किसी का भी समर्थन नहीं किया क्योंकि वहां पर उनकी पार्टी की सरकार चल रही है पर कर्णाटक से जुड़ा मामला होने के कारण उन्हें अधिकारी की ईमानदारी दिखाई देने लगी है. भारतीय राजनीति के साथ सामंजस्य बैठाने में जब किरण बेदी जैसी पूर्व पुलिस अधिकारी का यह हाल हो जाता है तो आम अधिकारियों से किसी निष्ठा की आशा कैसे की जा सकती है ?
                            ऐसे किसी भी मामले से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कड़े नियम बनाने और उन पर अमल करने के बारे में सोचना ही होगा तभी कुछ सही किया जा सकता है वर्ना हमेशा की तरह कोई अधिकारी खेमका, नागपाल या रुपा की तरह तबादले ही झेलने को अभिशप्त रहने वाला है. राजनैतिक मामलों से जुड़े किसी भी प्रकरण में तबादला आखिरी हथियार होना चाहिए और इस तरह के मामलों में विधायिका के पूरी तरह से फेल हो जाने के कारण न्यायपालिका को इसमें खुला हस्तक्षेप करने की छूट भी होनी चाहिए क्योंकि ये जनहित से जुड़े मुद्दे ही होते हैं. अधिकारियों के समय पूर्व तबादले के लिए विशेष कड़े नियम होने चाहिए और उन पर अमल करना सरकार के लिए बाध्यकारी भी होना चाहिए किसी भी तरह के विवाद के सामने आने पर जिला जज, जिलाधिकारी और राज्य व केंद्र की तरफ से आये हुए प्रतिनिधियों की समिति में ही उनके तबादले पर निर्णय किया जाना चाहिए जिससे ईमानदार अधिकारियों के लिए काम करने लायक माहौल को बनाये रखा जा सके. कहने को नेता यह कह सकते हैं कि इससे सरकार की कार्यक्षमता पर दुष्प्रभाव पड़ेगा और अधिकारी निरंकुश हो जायेंगें पर सोचने की बात तो यह है कि आज ऐसे कितने अधिकारी बचे हैं जो हर तरह की परिस्थिति में केवल कानून के अनुसार चलने की हिम्मत और विश्वास रखते हैं ? अधिकारियों को नेताओं के इस चंगुल से निकालने के लिए किसी न किसी को किसी न किसी स्तर पर प्रयास करना ही होगा जिससे आने वाले समय में प्रशासन और शासन के बीच इस तरह के खेल को बंद किया जा सके और ईमानदार अधिकारी अपना कार्य पूरी क्षमता के साथ कर सकें.
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