मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 3 December 2017

डॉक्टर-लैब-फार्मा कम्पनी गठजोड़

                                                       एक समय में चिकित्सा व्यवसाय को सबसे अच्छा माना जाता था और यह भी माना जाता था कि कोई भी डॉक्टर किसी भी परिस्थिति में अपने यहाँ आये हुए किसी भी रोगी के हित के लिए ही सदैव प्रयत्नशील रहता है पर आज के बदलते परिवेश में जिस तरह की ख़बरें और घटनाएं सामने आती हैं उनसे आम लोगों की इस धारणा को बहुत धक्का भी लगता है. नयी दवाओं और चिकित्सा जगत में होने वाले नए अनुसंधानों से देश के विभिन्न भागों में काम कर रहे डॉक्टर्स को परिचित कराने तथा उनको रोगियों के हितों में उपयोग करने के लिए लगभग हर दवा कम्पनी अपने स्तर से प्रयास करती है और अपने उत्पादों की बिक्री के लिए डॉक्टर्स को विभिन्न तरह के उपहारों से उपकृत भी करती रहती है. जब तक चिकित्सा जगत में व्यावसायिक घरानों की पैठ नहीं हुई थी तब तक सब कुछ ठीक ही चल रहा था पर जब से दवा कंपनियों ने फार्मा लाइन से जुड़े हुए डी फार्मा, बी फार्मा और एम फार्मा अभ्यर्थियों के स्थान पर एमबीए किये हुए लोगों के हाथों में बिक्री को सौंप दिया है तब से इस क्षेत्र का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है और दूसरी कम्पनी के बिकते हुए उत्पादों की होड़ में अब हर छोटी बड़ी कम्पनी कुछ भी बनाकर बेचने की राह पर चल चुकी हैं और इसमें दुर्भाग्य की बात यह है कि डॉक्टर्स सब कुछ जानते हुए भी सिर्फ अपने लालच के कारण इन कंपनियों के जाल में उलझे हुए हैं.
                                       यह सही है कि कई बार लक्षणों के आधार पर रोग का पता लगा पाना कठिन हो जाता है और दिखाई देने वाले लक्षणों के अतिरिक्त कोई और रोग भी किसी रोगी में हो सकता है जिसे जानने के लिए विभिन्न तरह की जांचें करवाने की आवश्यकता भी पड़ती रहती है. जब तक आवश्यकता हो तब तक इसे सही समझा जा सकता है पर जब यह भी कमाई का एक और जरिया बन जाए तो इस पर लगाम लगाने की आवश्यकता आ जाती है. आज बड़े शहरों में बड़ी लैब्स के साथ हज़ारों छोटी लैब्स मौजूद हैं जो अपने असली काम के साथ इस तरह के काम में भी लिप्त हैं पर सोचने वाली बात यह है कि लाखों रुपयों के खर्च के बाद स्थापित होने वाली लैब्स आखिर छोटे शहरों और कस्बों तक में कैसे खुलती जा रही हैं जबकि उनके पास आवश्यक चिकित्सक और लैब सुविधाएँ भी नहीं हैं ? यदि इन छोटे शहरों में बैठे हुए झोलाछाप चिकित्सकों और इन कुकुरमुत्तों की तरह उग आयी लैब्स पर ध्यान दिया जाये तो पूरे देश में यह हज़ारों करोड़ का अनैतिक कार्य सामने आ सकता है. इन कथित चिकित्सकों के पास कोई डिग्री नहीं होती जिससे वे केवल लैब से मिलने वाले अपने कमीशन के चक्कर में भी अनाप शनाप जांचें कराते रहते हैं जिससे पहले से ही परेशान रोगी पर और अधिक आर्थिक दबाव पड़ता है पर इस दिशा में सोचने का समय संभवतः किसी के पास नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों की नज़रें अभी तक इस गठजोड़ पर नहीं पड़ रही हैं.
                               इन सबसे बचने के लिए आखिर किस स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है अभी हमारे देश में किसी को भी इस बात की जानकारी भी नहीं है क्योंकि लोग आज भी भरोसे के चलते आँखें बंद करके अपने डॉक्टर और उसके बताये रास्ते पर चलते हैं. बंगलुरु में जिस तरह से चिकित्सकों और लैब के बीच का गठजोड़ सामने आया है और उसमें करोड़ों रुपयों की ज़ब्ती के साथ विदेशी मुद्रा भी मिली है तो क्या केंद्र सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को अविलम्ब इस बात पर सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आखिर यह सब कैसे रोका जाना चाहिए ? ऐसा नहीं है कि नेताओं और अधिकारियों को यह नहीं पता है पर उनके अपने स्वार्थ हर तरह की परिस्थिति में सिद्ध हो जाते हैं तो उन्हें आम लोगों की इस समस्या पर सोचने की आवश्यकता ही नहीं है. इस बारे में अब सरकार को हर डॉक्टर की डिग्री को आधार से जोड़कर उसके द्वारा पूरे साल में कराई जाने वाली जांचों पर नज़र रखने के लिए एक व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जिससे यह पता चल सकेगा कि वह डॉक्टर कितने रोगी देख रहा है और कितना धन लैब्स से ले रहा है साथ ही आयकर देने और उसके इस तरह की आमदनियों के बीच किस तरह का सामंजस्य है भी या नहीं ? इस तरह के कदम से जहाँ सरकार को अधिक राजस्व मिल सकता है वहीँ रोगियों के लिए सही जांचों तक डॉक्टर्स और लैब्स को सीमित किया जा सकता है.
                             ऐसा भी नहीं है कि आज सारे चिकित्सक लैब्स और फार्मा कंपनियां इस तरह के कामों में लिप्त है फिर भी यह मानकर काम नहीं चलाया जा सकता है कि हर जगह कुछ लोग गलत तरह से काम करते हैं. सरकार को इस दिशा में सुधार के लिए पहले एक व्यापक नीति बनानी होगी जिसके बाद ही उसको कानून का रूप दिया जा सकता है. रोगियों को अच्छी सुविधाएँ देने के लिए जन औषधि केंद्रों की तरह लैब्स की अवधारणा को भी मूर्त रूप दिया जा सकता है कम से कम जिला अस्पतालों की क्षमता को इतना अधिक बढ़ाये जाने पर बल दिया जाना चाहिए जो कम से कम अपने जिले के रोगियों को इस तरह की सुविधाएँ उचित दरों पर उपलब्ध कराने के केंद्र के रूप में विकसित किये जा सकें. इसके लिए सरकार को चिकित्सा में उच्च शिक्षा के लिए व्यापक सुधार करते हुए एमडी डीएम आदि स्तरों पर शिक्षा की अधिक व्यवस्था के बारे में सोचना ही होगा साथ ही आयुष मंत्रालय को इस दिशा में और अधिक कारगर बनाये जाने की आवश्यकता पर ही ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे रोगी के सामने हर स्तर की चिकित्सा सेवा लेने का विकल्प खुल सके और वह अपनी समस्या में किसी बड़े व्यावसायिक गठबंधन का शिकार न हो जाए.        
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Saturday, 25 November 2017

इंटरनेट बैन समस्या या समाधान ?

                                          निश्चित तौर पर इंटरनेट आज के समय में आम लोगों के बीच संवाद का बड़ा मंच बन चुका है जिसके चलते इसका दुरूपयोग रोकने के लिए सरकार की तरफ से कानून व्यवस्था से निपटने के लिए विभिन्न जगहों पर इस पर अस्थायी रोक लगाए जाने की परंपरा सी शुरू कर दी है जिससे आम लोगों को बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है. हरियाणा में एक जाट संस्था और सत्ताधारी दल के एक सांसद की जनसभा से आखिर वहां की कानून व्यवस्था किस तरह बिगड़ सकती है यह समझ से परे है पर इन सभाओं को लेकर राज्य के १३ जिलों में इंटरनेट सेवाओं पर २६ नवम्बर की मध्यरात्रि से तीन दिनों के लिए रोक लगा दी जाएगी. यहाँ पर यह समझना आवश्यक है कि आखिर सरकारों को इस तरह के कदम उठाने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ती है और संविधान से मिले लोकतान्त्रिक तरीके से जनसभा के अधिकार के साथ कोई भी सरकार ऐसे कैसे कर सकती है ? क्या आज इंटरनेट इतना प्रभावी है कि उसके चलते सरकारों के ख़ुफ़िया तंत्र खोखले और कमज़ोर साबित हो जाते हैं या आमलोगों में ही अपने अधिकारों के दुरूपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है जिसके चलते सरकारें भी सोशल मीडिया की इस शक्ति से निपटने के लिए इस पर रोक लगाने को ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प मानने लगी हैं ?
                                           यह ऐसा मुद्दा है जिसके बारे में कोई भी स्पष्ट रूप से यह नहीं खोज सकता है कि आखिर गलती किसकी है और किस तरह से इससे निपटा जाना चाहिए क्योंकि आज के युग में जब देश को डिजिटल बनाये जाने की कोशिशें की जा रही हैं तो समय समय पर इस डिजिटल युग में यह ब्लैक आउट किस तरह से सही ठहराया जा सकता है ? निश्चित तौर पर आज आमलोगों के बहुत से काम इंटरनेट के माध्यम से ही होते हैं बैंकिंग सेवाओं से लगाकर अधिकांश प्रशासनिक कार्यों को भो जिस तरह से नेट के माध्यम से किये जाने की सुविधाएँ देने के साथ सरकार इनको बढ़ावा देने में लगी है तो इस तरह की रोक आखिर इस अभियान को कहाँ तक सफल होने देगी ? जिन लोगों के आवश्यक बैंक या अन्य कार्य इंटरनेट के माध्यम से किये जाने होंगे वे भी इस अवधि में नहीं हो सकते जिससे इन ज़िलों की बहुत बड़ी आबादी को व्यापक रूप से समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. इस बारे में सरकार को भी अन्य विकल्पों पर सोचना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर ऐसे कदम उठाने के स्थान पर केवल सोशल मीडिया पर ही प्रतिबन्ध लगाए जाने की व्यवस्था पर काम करना चाहिए क्योंकि सरकार की समस्या पूरा इंटरनेट नहीं बल्कि सोशल मीडिया अधिक होता है और इससे निपटने के लिए सही दिशा में सही तरह से काम किये जाने की आवश्यकता भी है.  
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