मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 26 April 2018

वैचारिक अभिव्यक्ति और विभेद

                                                  अभी तक के स्थापित मानकों के अनुसार जिस तरह से यह समझा और कहा जाता कि शिक्षा बढ़ने के साथ मनुष्य का सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत विकास अच्छी तरह से हो सकता है पर पिछले कुछ दशकों में जिस तरह से अशिक्षितों के साथ शिक्षितों की मानसिक स्थिति भी एक जैसी ही होती जा रही है वह सम्पूर्ण मानव जाति के लिए आने वाले समय में एक खतरा बन सकती है. विश्व के कई देशों में इस्लाम के नाम पर चल रहे चरमपंथ को जिस तरह से उच्च शिक्षित लोगों का समर्थन मिलने लगा उससे पुरानी धारणा टूटने की तरफ बढ़ गयी की शिक्षा से मनुष्य अधिक सामाजिक हो जाता है. सौभाग्य से भारत में इस तरह की घटनाएं बहुत कम या नहीं ही दिखाई देती थीं पर अब इसमें भी तेज़ी से बदलाव दिखाई दे रहा है जिसका पूरा और विपरीत असर समाज पर आने वाले समय में गंभीर रूप से पड़ने के अब इंकार नहीं किया जा सकता है. बंगलुरु में एक महिला ने अपनी कैब सिर्फ इसलिए कैंसल कर दी क्योंकि उस पर आज ट्रेंड में चल रहे गुस्से भरे हनुमान जी का चित्र अंकित था जिसे उन्होंने कठुआ और उन्नाव में हिंदुत्ववादी शक्तियों द्वारा आरोपितों के पक्ष में खड़े होने के चलते खुद अपनी सुरक्षा से जोड़ते हुए ही उसे एक खतरा मान लिए था. इसके बाद एक व्यक्ति ने लखनऊ से अपनी कैब राइड सिर्फ इसलिए कैंसल कर दी क्योंकि उसका चालक मुसलमान था ?
                                            देखने में ये घटनाएं सामान्य से लगती हैं पर क्या ये समाज में हर स्तर पर पनप रहे अनदेखे विभाजन की तरफ संकेत नहीं करती हैं ? क्या इंटरनेट और सोशल मीडिया को चलाने वाले किसी भी उच्च शिक्षित नागरिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस निम्न स्तर पर जाकर समाज के निर्धारित ताने बाने को झकझोरने का काम करे जिससे अंत में उसको भी कहीं न कहीं नुकसान ही होने वाला है ? क्या शिक्षा का स्तर और संस्कारों की पकड़ को इस तरह के मामलों में महसूस किया जा सकता है ? किसी भी महिला या पुरुष को किसी विशेष परिस्थिति में अपने लिए कोई स्थिति प्रतिकूल लग सकती है पर क्या उस प्रतिकूल परिस्थिति को इस तरह से देश के निम्न होते राजनैतिक विमर्श से गंभीरता से जोड़ने को उचित कहा जा सकता है ? क्या बाहरी दिखावे से कोई शत प्रतिशत किसी के व्यक्तित्व के बारे में एक बार में ही सब कुछ जान समझ सकता है और क्या उसका यह आंकलन यह सही भी हो सकता है ? एक महिला को यदि किसी चिन्ह विशेष के कारण असुरक्षा दिखाई दी तो क्या उसे इस तरह से दिखाना उचित था या एक पुरुष को उस महिला के ट्वीट का जवाब देने के लिए एक मुस्लिम चालक की कैब राइड का इंतज़ार कर उसे कैंसिल कर ट्वीट करना उचित था ? बेशक दोनों की अपनी सुरक्षा सम्बन्धी चिंताएं हो सकती हैं पर उन्हें इस तरह से परिभाषित किये जाने को आखिर क्या कहा जाये ?
                                            क्या इस तरह की घटनाओं में शामिल महिला और पुरुष अपने आस पास देखकर यह बता सकते हैं कि धर्म और प्रतीक चिन्हों के नाम पर अपने को समाज से अलग कर कथित रूप से सुरक्षित करके क्या वे भारतीय समाज में जीवित रह सकते हैं ? क्या देश के विभिन्न धार्मिक अनुयायियों के बिना उनके लिए सामान्य जीवन यापन कर पाना संभव हो सकेगा या वे अपनी इस मानसिकता के साथ पूरे समाज में एक विभाजन की खरोंच लगाने का काम करते रहेंगें जो भविष्य में गहरी खाई भी बन सकती है ? आप चिन्ह विशेष लगाए होने के कारण किसी की सेवाएं नहीं ले सकते हो पर जो चिन्ह लगाकर लगातार धोखा देने का काम कर रहे हैं उनसे खुद को सुरक्षित रखने के लिए क्या उपाय करने वाले हैं ?  जिनको लगता है कि चालक मुस्लिम है इसलिए वे सुरक्षित नहीं हैं तो हो सकता है कि उस कार को उनके जैसी मानसिकता वाले किसी मुस्लिम मिस्त्री ने भी यह सोचकर ठीक किया हो कि इसमें कोई हिन्दू यात्री बैठेगा इसलिए इसके ब्रेक ख़राब कर देता हूँ तो सोचिये हमारे समाज का क्या हाल होगा ? अच्छा हो कि आम नागरिक नेताओं की विभाजनकारी नीतियों के बारे में गंभीरता से सोचें और अपने लिए वही रास्ता अपनाएं जो समाज में समरसता की तरफ ले जाने का काम करता हो क्योंकि सामाजिक वैमनस्यता का खमियाज़ा आमतौर पर नेताओं को नहीं बल्कि आम जनता को ही भुगतना पड़ता है।  
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Sunday, 22 April 2018

सामाजिक समस्या का कानूनी हल ?

                                                                   निर्भया की मौत के बाद देश के कानून में बलात्कारियों को कड़ी सजा देने के लिए बनाये गए पाक्सो कानून के बाद भी महिलाओं/ बच्चियों के साथ होने वाले यौन अपराधों की स्थिति में कुछ बदलाव दिखाई नहीं दिए जबकि उस समय भी सरकार द्वारा यही कहा गया था कि कड़े कानून होने से लोग इस अपराध को करने के बारे में सोचेंगें भी नहीं पर रसाना और उन्नाव की बड़ी चर्चित घटनाओं के बाद जिस तरह से सत्ताधारी दल के लोगों की संलिप्तता के चलते पीड़ितों को न्याय मिलने से रोकने की कोशिशें की जाती रहीं उसके बाद केंद्र सरकार दबाव में आ गयी और उसकी परिणिति एक और कानूनी संशोधन के रूप में सामने आती दिखाई दी है. यह समय क्या हमें एक देश और समाज के रूप में यह फिर से सोचने को मजबूर नहीं करता है कि इतने कानूनी प्रयासों के बाद भी आखिर ये अपराध रुकने का नाम क्यों नहीं लेते हैं ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते समाज में आज भी वो लोग उसी संख्या में मौजूद हैं जो मनुष्यों के विकास के समय से होते रहे हैं ?
                                        इस समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले तो जिस सामाजिक चेतना को बढ़ाये जाने की आवश्यकता है हम उसमें पूरी तरह से निकम्मे साबित हो रहे हैं क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को घर, समाज, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर जिस तरह का व्यवहार झेलना पड़ता है उसको सुधारने की दिशा में आज भी कोई कदम नहीं उठाये जा रहे हैं जिससे समाज में शिक्षितों की संख्या बढ़ने के बाद भी समाज की रूढ़ियों के चलते आज भी महिलाओं को  पुरुषों से निम्न स्तर का समझा जाता है. आज भी हर आम भारतीय परिवार की प्राथमिकता परिवार की हर पीढ़ी में एक लड़के की चाहत से लड़कियों की स्थिति कमज़ोर होना शुरू हो जाती है. बेटियों के साथ जो समाज गर्भ से ही दोहरा व्यवहार करना शुरू क्र देता हो उससे किसी कानून के डर से अपराधों की तरफ न मुड़ने की आशा करना हो मूर्खता है और हम केवल कानून के सहारे इस सामाजिक बुराई से लड़ने की खोखली कोशिशें करने में ही अपने कर्तव्य को पूरा मान लेते हैं?
                                 आज समस्या जिस स्तर पर है पर उससे निपटने के लिए हमें कानूनी स्तर पर प्रयास करने के स्थान पर सामजिक स्तर पर अधिक सक्रिय होने की आवश्यकता है और धरातल पर समाज की मानसिकता को बदलने के साथ महिलाओं के लिए पुलिसिंग को सुधारने की दिशा में गंभीरता गंभीरता से सोचने की ज़रुरत है यह सही है कि अपराधों को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता है पर यदि आने वाली पीढ़ी में लड़कियों और महिलाओं को बराबरी के दर्ज़े पर रखने की कोशिश अभी से शुरू की जाये तो दो तीन दशकों में इसके परिणाम सामने आ सकते हैं. केवल कानूनों को कड़ा करते जाने से क्या समाज की मानसिकता को बदला जा सकता है आज यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि कानून किसी के घर और समाज में घुसकर मानसिकता में बदलाव नहीं कर सकता है क्योंकि उसकी अपनी सीमायें भी हैं. जब तक समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं होगा और यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते नारों से निकल कर दिलों में नहीं आएगा और जब तक कन्या पूजन नवरात्रि से आगे बढ़कर समाज की दिनचर्या का हिस्सा नहीं बनेगा तब तक बच्चियों और महिलाओं के प्रति होने वाले इन अपराधों से निपटा नहीं जा सकेगा।          
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