मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 12 August 2017

गोरखपुर-लापरवाही से मौतें

                                            अगस्त का महीना बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के गंभीर मरीज़ों पर कितना भारी पड़ा यह ऑक्सीजन की कमी के चलते होने वाली मौतों को देखकर समझा जा सकता है क्योंकि गोरखपुर के ही योगी आदित्यनाथ के यूपी के सीएम बनने के बाद जिस तरह से पूर्वांचल की किस्मत संवरने की बातें की जा रही थीं यह लापरवाही उस पूरी व्यवस्था और संकल्प का पोल खोलने के लिए काफी है. इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक बात यह भी है कि खुद सीएम आदित्यनाथ ने कुछ दिन पहले ही मेडिकल कॉलेज का दौरा किया था जिसमें सब कुछ सही होने का दावा किया गयाथा पर उसके तुरंत बाद ही इस तरह की अव्यवस्था सामने आयी है ? पूरे मामले में एक बात सामने आ रही है कि कॉलेज को ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली निजी फर्म की तरफ से १ अगस्त को ही कॉलेज प्रशासन को सूचित कर दिया गया था कि लगभग ६५ लाख के बकाये का भुगतान न होने की दशा में उसके लिए निर्बाध ऑक्सीजन सप्लाई कर पाना संभव नहीं होगा इसके बाद भी कॉलेज प्रशासन, जिला प्रशासन या राज्य शासन की तरफ से इस मामले में कोई सार्थक पहल नहीं की गयी जो कि अपने आप में बहुत ही चिंताजनक है. मानसून का यह महीना वैसे भी पूर्वांचल के लोगों पर जापानी बुखार के चलते कई दशकों से अभिशाप ही बना हुआ है पर इस बार मानवीय लापरवाहियों के चलते इस तरह की मौतें होने की घटना पहली बार सामने आयी है.
                            निश्चित तौर पर यह खुद सीएम आदित्यनाथ और भाजपा के लिए बहुत शर्मिंदगी की बात है क्योंकि उनकी तरफ से पूरी व्यवस्था को सुधारने की बात कही जा रही है पर साथ ही इस तरह की घटनाओं से यह भी दिखाई देने लगता है कि सरकार मूलभूत बिंदुओं को नज़रअंदाज़ करते हुए अपने अनुसार ही सब कुछ चलाना चाहती है जबकि बहुत सारी व्यवस्थाएं अपने आप में पूर्ण रूप से पहले से ही निरापद हैं बस उनके सञ्चालन में लगे हुए लोगों को सही दिशा में निर्णय लेने की आवश्यकता है. इस तरह की लापरवाही में निश्चित तौर पर सीधे तौर पर सरकार का कोई हाथ नहीं होता है पर विपक्षी दल सदैव ही इस तरह के मामलों में अपनी राजनीति को आगे करने की कोशिशें करते रहते हैं तो इस बार भी यूपी और केंद्र में विपक्षी दलों को इस मामले को हवा देने का काम ही करना है. सरकार की तरफ से कुछ समितियां बनाकर लोगों को निलंबित करने का काम ही किया जाना है क्योंकि उसे अपने ऊपर आने वाले दबाव को पूरी तरह से हटाना भी है तथा यह भी सन्देश देना है कि उनकी प्राथमिकता में सब कुछ सुधारना भी है और दोषियों को किसी भी स्तर पर छोड़ा भी नहीं जायेगा भले ही वह कितने ऊंचे पद पर ही क्यों न हो. पर इस तरह की सजा देने और भूल जाने की प्रवृत्ति के चलते ही आज भी ऐसे हादसे होते रहते हैं जिनको थोड़ी सावधानी के साथ पूरी तरह से रोका भी जा सकता है.
                            जिन निर्दोषों की मौत इस घटना में हुई उनके प्रति संवेदना के साथ सरकार को आगे के लिए ऐसी व्यवस्था बनाने के बारे में सोचना चाहिए जिससे कोई भी निजी फर्म इस तरह से केवल पत्राचार के माध्यम से ही ऑक्सीजन सप्लाई या अन्य अतिआवश्यक और महत्वपूर्ण कार्य को रोक न सके. इसके लिए खुद सरकार को भी यह नियम बनाना होगा कि किसी भी निजी फर्म का बकाया भी समय से चुकाया जाये क्योंकि इस मामले में भुगतान न होना ही समस्या का मूल कारण बताया जा रहा है. स्थानीय एजेंसियों के भुगतान में असफल रहने पर उसकी सूचना स्वतः ही राज्य मुख्यालय तक पहुँचने की एक केंद्रीयकृत व्यवस्था भी होनी चाहिए. साथ ही सरकार को और भी संवेदनशील होने की आवश्यकता है क्योंकि जिस तरह से सरकार की तरफ से यह कहा गया कि मौतें ऑक्सीजन की कमी से नहीं बल्कि अन्य कारणों से हुई हैं तो वह सरकार का झूठ खोलने का काम करने वाला ही साबित हुआ क्योंकि इस बारे में गोरखपुर दैनिक जागरण ने पहले ही एक खबर प्रकाशित की थी जिसमें इस खतरे के बारे में आगाह किया गया था. इस मामले में जहाँ मेडिकल कॉलेज प्रशासन, मंडल और जिला प्रशासन की लापरवाही सामने आ रही है वहीं एसएसबी और निजी क्षेत्र के चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के अभूतपूर्व सहयोग की बात भी सामने आ रही है जिनके प्रयासों से मौतों के सिलसिले को रोकने में मदद मिली थी. सीएम आदित्यनाथ को इस मामले को अपने स्तर से देखना चाहिए क्योंकि गड़बड़ी कहाँ से अधिक हुई यह खुद गोरखपुर में उनके अपने समर्थक आसानी से स्पष्ट कर सकते हैं जिससे उन्हें इस तरह की घटनाओं को रोकने में सहायता मिल सकती है.         
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Friday, 21 July 2017

राष्ट्रपति और राजनीति

                                                       निर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के जीतने पर एक बार फिर से उनके दलित्त होने को मुखर रूप से समाचारों में रेखांकित किया जा रहा है जबकि उनके जीत जाने के बाद इस तरह की बातें किये जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी. निश्चित तौर पर अपने प्रत्याशी को जिताने लायक संख्या होने पर कोई भी सरकार या पीएम अपनी पसंद के कम समस्या पैदा करने वाले व्यक्ति को ही राष्ट्रपति पद पर देखने के आकांक्षी होते हैं और साथ ही देश के राजनैतिक पटल पर भी अपने समीकरणों को साधने की कोशिशें करते हुए देखे जाते हैं तो ऐसी स्थिति में पीएम मोदी और भाजपा की तरफ से यदि ऐसा किया गया तो कोई बड़ी बात नहीं है. वैसे भी पीएम मोदी के बारे में कहा जाता है कि उन्हें असहमति के शब्द अच्छे नहीं लगते हैं तो आज किसी को भी इस पद तक पहुँचाने की स्थिति में मज़बूत पीएम मोदी ने भी देश के सर्वोच्च पद के लिए कोविंद का चुनाव करके एक तरह से अपनी स्थिति को और मज़बूत ही किया है. सरकार किस व्यक्ति को इस पद पर देखना चाहती है यह उसकी मर्ज़ी है और उस पर सवाल लगाने का कोई मतलब भी नहीं बनता है पर दलित होने के साथ विवादों से दूर रहना कोविंद के लिए उस समय बहुत काम आया जब पीएम मोदी उनके जैसे व्यक्ति को खोज रहे थे.
                                     देश में राष्ट्रपति पद पर बैठे राजनैतिक व्यक्तित्वों में से कई लोगों ने तो अपने पद के साथ पूरी तरह से न्याय किया वहीं कई लोगों की तरफ से केवल सरकार के रबर स्टैम्प की भूमिका ही निभाई गयी. एक समय इंदिरा गाँधी कि हाँ में हाँ मिलाने वाले ज्ञानी जैल सिंह ने भी राजीव गाँधी की मज़बूत सरकार के लिए परेशानी भरे पल पैदा कर देने में कोई कस्र नहीं छोड़ी थी. देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन ने भी जिस तरह से इस पद की गरिमा को बचाये रखने के लिए लगातार कोशिशें की थीं वे अपने आप में एक उदाहरण हैं और आज कोविंद से उस तरह एक आचरण की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है. आम तौर पर पार्टी में सक्रिय नेताओं को जीवन के अंतिम चरण में राष्ट्रपति बनाकर पुरुस्कार देने की परंपरा सी चलती आयी है पर इस मामले में सबसे चौंकाने वाला निर्णय कमज़ोर कहे जाने वाले पीएम मनमोहन सिंह की तरफ से उठाया गया था जब वे राजनैतिक स्तर पर संसद से सड़क तक घिरे हुए थे तो भी उन्होंने अपनी सरकार में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले और विभिन्न विपरीत परिस्थितियों में उनकी सरकार को संकट से उबारने वाले लम्बे राजनैतिक जीवन के अनुभवी प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए आगे किया था.
                                प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल अपने आप में बहुत अच्छा कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने देश में पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ बनने वाली भाजपा की सरकार और पीएम मोदी के साथ तीन वर्षों से भी अधिक समय तक काम किया और कहीं से भी सरकार या विपक्ष के साथ किसी भी तरह के अनुचित व्यवहार या पक्ष का पोषण नहीं किया. बिहार के राज्यपाल के रूप में कोविंद का कार्यकाल भी बहुत अच्छा रहा तभी जेडीयू ने विपक्ष से अलग चलते हुए उनके लिए वोट करने के बारे में सोचा था. कोविंद से भी पूरा देश निष्पक्ष रूप से अपनी राय रखने और सरकार के साथ विपक्ष और देश के मौजूदा हालातों पर नज़र रखने की अपेक्षा ही रखता है. मज़बूत पीएम मोदी अपने गुरु आडवाणी या सुषमा स्वराज जैसे राजनैतिक रूप से बेहद मुखर नेता को इस पद तक पहुँचाने का वो साहस नहीं दिखा पाए जो पीएम के रूप में मनमोहन सिंह ने अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगी को यहाँ पहुंचाकर किया था. वैसे तो राष्ट्रपति के लिए करने को कुछ ख़ास नहीं होता है फिर भी कोविंद से देश यह आशा तो कर ही सकता है कि अब वे भी केवल संघ, भाजपा या मोदी के पीएम के स्थान पर पूरे देश के राष्ट्रपति बनकर उसी तरह का आचरण दिखाएंगें जैसा उनके पूर्ववर्ती प्रणब मुखर्जी द्वारा दिखाया गया है.   
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