मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 22 June 2017

योग दिवस - बड़े आयोजन और विषमताएं

                                                   
 लखनऊ में विश्व योग दिवस पर आयोजित किये कार्यक्रम में मौसम विभाग का पूर्वानुमान होने के बाद भी जितनी बड़ी संख्या में बच्चों को इसके लिए लाया गया उसे किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता है क्योंकि केवल ज़्यादा लोगों को इकठ्ठा करने और रिकॉर्ड बनाने के लिए इस तरह के कार्यक्रम किये जाने का औचित्य समझ में नहीं आता है. २१ जून का समय देश में ऐसा है कि कुछ हिस्सों में मानसून आ चुका होता है और कुछ स्थानों पर स्थानीय कारणों से मानसून पूर्व वर्षा भी होने लगती है तो क्या सरकार और अधिकारियों को इस कार्यक्रम को इंडोर स्टेडियम में करवाने के बारे में एक स्थायी नीति के रूप में स्वयं ही स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए ? आज जब मौसम ख़राब होने के १० मिनट पहले ही उसका अलर्ट मोबाइल तक पर उपलब्ध है तो इतने महत्वपूर्ण कार्यक्रम जहाँ खुद देश के पीएम उपस्थित होने वाले हों उसमें इस तरह की बाबूगिरी सदैव ही कार्यक्रम की मंशा को पूरा नहीं होने देती है. पीएम मोदी को निश्चित तौर पर बड़े इवेंट पसंद हैं और यूपी में प्रचंड बहुमत के बाद सरकार बनाने की ख़ुशी में इस बार उनकी यहाँ के लोगों के साथ योग दिवस मनाने की मंशा भी सराहनीय ही है पर कुछ बातों की अनदेखी करने से जिन लोगों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है उनके लिए ऐसे कार्यक्रम दु:स्वप्न ही बन जाते हैं.
                                      पानी में भीगने के कारण कार्यक्रम स्थल पर रात भर जगे २१ बच्चों पर जो दुष्प्रभाव पड़ा उसके चलते उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा और सर्दी से बचने के लिए उन्हें ब्लोअर चलाकर रखना पड़ा जिससे उनको और उनके परिवार वालों को अनावश्यक रूप से परेशान होना पड़ा. आज जिस स्तर पर संसाधन उपलब्ध हैं उनके सदुपयोग से मानवीयता को अधिक महत्व देते हुए अधिकारियों के और भी संवेदनशील होने की आवश्यकता है क्योंकि पीएम या सीएम अपने कार्यक्रम को सफल ही देखना चाहेंगें पर अधिकारियों के इस तरह के रवैये कई बार कार्यक्रम के आनंद को कम करने का काम किया करते हैं. इस बारे में सभी लोगों को यह ध्यान रखना ही होगा कि इतने बड़े स्तर पर आयोजित किये जाने किसी भी कार्यक्रम में यदि बच्चों की सहभागिता हो रही है तो उनके लिए समुचित व्यवस्था भी होनी चाहिए क्योंकि बच्चे बड़ों की तरह लम्बे समय तक अनुशासन और विषमताएं नहीं झेल पाते हैं और उनके लिए विभिन्न तरह की समस्याएं खडी हो जाती हैं. बारिश के बाद बदली हुई परिस्थिति में लखनऊ जिला प्रशासन और पुलिस द्वारा पीएम के कार्यक्रम के समाप्त होने के बाद जिस तरह से आये हुए लोगों का ध्यान नहीं रखा गया वह अपने आप में यहाँ आने वाले लोगों के लिए बुरा अनुभव हो रहा है.
                                     साथ ही पानी बरसने के कारण कार्यक्रम में आयी सैकड़ों बसें जिस तरह से रैली स्थल के कच्चे हिस्से के कीचड में फँसी उससे भी लोगों को बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा और इनमें से ८० बसें क्रेन मंगवाने पर भी दोपहर १२ बजे तक निकल सकीं जिनसे बच्चों को वापस जाना था. लखनऊ के आसपास के ज़िलों से मंगाई गयी क्रेन्स पहले ही समारोह स्थल पर उपलब्ध थीं पर इस बारे में इस तरह के आदेश देने वाले अधिकारी नदारत थे जिससे परिवहन विभाग के अधिकारियों और रोडवेज कर्मचारियों ने इस कार्य को पूरा करने में हाथ बंटाया. इस तरह की परिस्थिति के बारे में पहले से विचार करने के बाद ही कार्यक्रम के स्वरुप को तय किया जाना चाहिए. आशा की जा सकती है कि आने वाले वर्षों में पीएम और अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति जिस भी स्थान के कार्यक्रम में सम्मिलित हों वहां के अधिकारी, पुलिस और राज्य सरकार इन पहलुओं पर भी ध्यान अवश्य दें क्योंकि २१ जून को देश के मौसम के बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है. बेहतर हो कि पीएम के कार्यक्रम को उन शहरों में ही आयोजित करने के बारे में सोचा जाये जहाँ इंडोर स्टेडियम की व्यवस्था हो और एक नीति के अंतर्गत दोहरे काम के लिए खेल मंत्रालय राज्यों के साथ मिलकर राज्यों की राजधानियों में इंडोर स्टेडियम बनाने की एक नीति पर भी काम कर सकता है जिससे आधारभूत संरचना के विकास तथा रोज़गार सृजन के साथ खेल को बढ़ावा मिलेगा और आवश्यकता पड़ने पर उसका इस तरह से सदुपयोग भी किया जा सकेगा.     
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Saturday, 10 June 2017

आधार - सुरक्षा और चिंताएं

                                       २००९ में यूपीए-२ सरकार ने देश के नागरिकों की सही पहचान जानने के लिए जिस तरह से आधार के नाम से बायो मेट्रिक पहचान की वैकल्पिक व्यवस्था की परिकल्पना की थी आज समय बीतने के साथ सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने के लिए यह सबसे बड़े हथियार के रूप में सामने आ चुका है. प्रारम्भ में इसका उद्देश्य नागरिकों की पहचान की ऐसी केंद्रीयकृत व्यवस्था बनाना था जिसके माध्यम से देश के किसी भी कोने में गए हुए नागरिक की पहचान सरकारी अभिलेखों से सही और प्रामाणिक तरीके से जानी जा सकती हो. किसी भी नागरिक की बायो मेट्रिक पहचान उसकी निजता का मामला है और इस तरह से आधार क्या पहचान के नाम पर किसी भी नागरिक की निजी जानकारी का उपयोग किया जा सकता है यह स्पष्ट न होने के कारण आधार के शुरू किये जाने के समय से ही लगातार इस पर प्रश्न उठाये जाते रहते हैं. फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के समक्ष विचार के लिए पहुंचा हुआ है जिससे यह स्पष्ट है कि किसी न किसी स्तर पर बायो मेट्रिक केंद्र का व्यक्ति भ्रष्टाचार के कारण किसी भी नागरिक की बायो मेट्रिक जानकारी का दुरूपयोग कर सकता है और इससे बचने के लाख दावों के बीच आज भी जगह जगह से नागरिकों के डाटा को सार्वजनिक किये जाने के समाचार सामने आते रहते हैं.
                                     निश्चित तौर पर आज हम जिस तरह के विश्व में जी रहे हैं उसमें भारत जैसे विशाल देश में नागरिकों की सही पहचान किये जाने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि केवल सरकारी योजनों में भ्रष्टाचार ही नहीं बल्कि सुरक्षा एजेंसियों के लिए किसी संदिग्ध की सही पहचान में भी आधार का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है और संभवतः आने वाले समय में सरकार इसके इस स्वरुप पर भी विचार करने की तरफ सोचे. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से आधार को पैन नंबर से जोड़े जाने को अनिवार्य किये जाने पर अस्थायी रोक लगायी है इस तरह की लगातार सामने आने वाली समस्याओं से निपटने के लिए केंद्र सरकार को अब आधार पर व्यापक विमर्श के बाद एक मज़बूत कानूनी कवच देने की आवश्यकता है जिससे महत्वपूर्ण योजनाओं में इसे लागू करने में हर बार विलम्ब न होता रहे. कानूनी पचड़े में उलझने के कारण सदैव ही योजनाओं का वह स्वरुप सामने नहीं आ पाता है जिस तरह से लागू किये जाने के बारे में सोचा जाता है. विभिन्न विभागों में आवश्यकता पड़ने पर छोटे संशोधनों को करने के स्थान पर आधार की आवश्यकताओं, चुनौतियों, समस्याओं से जुड़ा एक व्यापक विधेयक संसद से पारित करने के बारे में सोचा जाना चाहिए जिससे राज्यों और केंद्रीय स्तर पर योजनाओं में आधार के समुचित उपयोग की व्यवस्था की गयी हो.
                                    आधार का एक दूसरा सामाजिक पहलू भी है जिससे सरकार चाहकर भी पीछा नहीं छुड़ा सकती है क्योंकि जिस तरह से आज विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी उसे अघोषित रूप से अनिवार्य ही किया जा चुका है उससे आज भी आधार से वंचित लोगों उन सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है जो उनके लिए बनाई जाती हैं. मनरेगा जैसे कार्यक्रम का उदाहरण लिया जाये तो जिन लोगों के पास आधार नहीं था उनका जॉब कार्ड बनना अब बंद हो चुका है पर जितने व्यापक रूप में हर व्यक्ति की आधार पहचान को उपलब्ध कराने पर सरकार का ध्यान होना चाहिए अब वह उससे भटकी हुई लगती है. जिन लाखों लोगों के नाम आधार न होने के कारण योजनाओं से काट दिए गए हैं सरकार उन्हें फ़र्ज़ी ही मानती है जबकि आज भी करोड़ों लोगों के पास आधार नहीं है तो क्या ये सब फ़र्ज़ी नागरिक हैं ? सरकार की ज़िम्मेदारी योजनाओं को उन लोगों तक पहुँचाने की भी है जिनके लिए उन्हें बनाया जा रहा है इसलिए एक बार फिर से सम्पूर्ण देश में आधार से वंचित लोगों की जाँच की जाने चाहिए और इसके लिए बायो मीट्रिक डिवाइस के साथ हर घर में जाकर सभी की उँगलियों के निशान के माध्यम से चेक करना चाहिए कि उनका पंजीकरण हो चुका है या नहीं ? यदि इस अभियान में किसी के पास आधार नहीं है तो उसका तुरंत ही पंजीकरण किया जाना चाहिए जिससे पूरे देश के हर नागरिक तक इसकी पहुँच बनायीं जा सके.
                                   निश्चित तौर पर आधार के उपयोग से मनरेगा, गैस और अन्य जगहों पर सरकार को बचत हुई है क्योंकि इसमें बड़े पैमाने पर दोहरा लाभ लेने वालों की छंटनी आसान हो गयी पर साथ ही बहुत सारे वे लोग भी योजनाओं से वंचित हो गए जिनके वे पात्र हैं. अब सरकार को इस दिशा में भी सोचने की आवश्यकता है और आने वाले समय में तकनीक के और उन्नत होने पर हर मोबाइल में बायो मीट्रिक पहचान चिन्हित करने वाली व्यवस्था आ सकती है जिससे नागरिक स्वयं को विभिन्न योजनाओं में अपने मोबाइल के माध्यम से ही पंजीकृत करने का काम कर सकते हैं. इससे जहाँ अनावश्यक रूप से लाखों पन्ने कागज़ बचाया जा सकेगा वहीं कागज़ के दुरूपयोग से भी बचा जा सकेगा. सूचनाएँ लीक करने या उनका अपने निजी हितों के लिए दुरूपयोग करने की स्थिति में सरकार को दोषी पाए जाने वाले के विरुद्ध कड़े कानूनी उपाय भी लागू करने चाहिए जिससे नागरिकों की पहचान को सुरक्षित रखा जा सके. वैसे कोई भी तकनीक पूर्ण रूप से निरापद नहीं होती है पर क्या इसके लीक होने की सम्भावना है सिर्फ इस डर से ही क्या हम बैंक में खाते खोलना बंद कर सकते हैं क्योंकि वहां पर हमारी कमाई गयी पूरी पूँजी जमा होती है ? सरकार प्रयासरत है और आने वाले समय में इस दिशा में और भी महत्वपूर्ण दिशा निर्देशों के साथ डाटा सुरक्षित रखने के और भी कठोर प्रावधान किये जायेंगें ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए.     
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