मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 28 August 2016

कश्मीर में वार्ता की राह

                                                                   बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से ही पाक के इशारे पर सुलग रही कश्मीर घाटी के लिए अब केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग और मतभेदों के साथ वार्ता की बात भी सामने आ रही है. निश्छित तौर पर इस परिस्थिति से  केवल कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता है पर जिस तरह से इस महत्वपुर्ण मुद्दे पर भारत और केंद्र सरकार की छवि पर आंच आ रही है उस पर तत्काल कदम उठाये जाने की आवश्यक भी है. पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह की घाटी यात्रा और फिर सीएम महबूब मुफ़्ती का दिल्ली में पीएम मोदी से मिलना यही दर्शाता है कि अभी तक बातचीत का विरोध करने वाली राज्य सरकार ने भी अपने तेवरों में कुछ नरमी दिखाई है और अब वह केंद्र की तरह से भी कुछ आश्वासन चाहती है जिससे राज्य में इस गतिरोध को तोड़ा जा सके तथा जनजीवन को सामान्य किया जा सके. सीएम महबूबा का कहना कि केवल ५% लोगों ने पूरी घाटी को बंधक बना रखा है कहीं तक सही है पर बाकि ९५% अपनी जान बचाने के चक्कर में सामने आने से डर भी रहे हैं और जब तक यह डर कम नहीं होगा घाटी के आम लोग सामने नहीं आ पायेंगें.
                             अपने गठन के समय से बुरहान वानी के मारे जाने तक मोदी सरकार ने पाक और नवाज़ शरीफ से हर स्तर पर सम्बन्ध सुधारने की हर संभव कोशिशें की पर पाक की इन्हीं हरकतों के चलते उसे मुम्बई हमले के बाद अलग थलग करने के लिए ही मनमोहन सरकार ने किसी भी द्विपक्षीय मुद्दे पर हर स्तर पर पाक से वार्ताएं बंद कर दी थीं और केवल उन्हीं मंचों से पाक से सम्बन्ध रखा जा रहा था जो अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अन्तर्गत आते थे. मोदी सरकार के सम्बन्ध सुधारने के प्रयासों को किसी भी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता है पर केवल सुधारने के लिए ही अटल सरकार ने लाहौर बस यात्रा के साथ हो रही कारगिल घुसपैठ पर ध्यान नहीं दिया जिसकी बड़ी कीमत हमें अपने जवानों को खोकर चुकानी पड़ी थी. अब जिस तरह से पीडीपी-भाजपा सरकार में फिर से घाटी और जम्मू का बंटवारा दिखाई दे रहा है वह कहीं से भी मामले को शांत नहीं कर सकता है क्योंकि आज़ादी के बाद से ही कश्मीर को लेकर दिए गए अति उग्र राष्ट्रवादी बयानों में भाजपा ने जो कुछ भी कहा था आज वह उसे वार्ता के लिए राज़ी होने से रोक रहा है पर मोदी लीक से हटकर चलने में विश्वास करते हैं तो हो सकता है कि संघ और पार्टी की लाइन से हटकर वे अलगाववादियों से बात करने की पहल भी कर दें।
                            धर्मगुरु श्री श्री रविशंकर ने कल जिस तरह से बुरहान वानी के पिता के साथ आश्रम में ली गयी अपनी एक फोटो ट्विटर पर शेयर की उससे लगता है कि बातचीत के लिए मोदी सरकार मन बना चुकी है पर उसके लिए सही समय और शर्तों पर बात चल रही है. यदि श्री श्री के हस्तक्षेप से ही कश्मीर का गतिरोध टूट सकता है तो उसमें कोई बुराई नहीं है पर जिन राष्ट्रवादियों को बुरहान वानी के पिता के स्कूल मास्टर होने पर आपत्ति थी वे श्री श्री के साथ उनकी फोटो देखकर अवश्य ही निराश होंगें। सरकार की इस तरह की हर दिशा में की जा रही कोशिशों को सही कहा जा सकता है पर उसके मंत्रियों, संघ विचारकों और पार्टी पदाधिकारियों को भी यह समझना होगा कि अब भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है और देश के सामने आने वाली इस तरह की किसी भी समस्या का समाधान उसे ही करना है. एक तरफ पीएम, एचएम् और डीएम पीओके की बात करते हैं तथा कहते हैं कि कश्मीर कोई मसला ही नहीं है वहीँ विदेश राज्य मंत्री अकबर कहते हैं कि कश्मीर द्विपक्षीय मामला है और पाक इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर कुछ भी हासिल नहीं क्र सकता है. सरकार को इस तरह की राजनीति से आगे बढ़कर कश्मीर घाटी के लिए ठोस बातचीत का माहौल बनाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए.
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Saturday, 27 August 2016

स्कॉर्पीन लीक का असर

                                                             देश की नौसेना के लिए भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए खरीदी जा रही स्कॉर्पीन पनडुब्बियों से जुडी महत्वपूर्ण जानकारी लीक होने के बाद केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय की तरफ से इसे बहुत ही हलके में लिया गया वह चिंता का विषय भी है क्योंकि नौसेना की सामरिक तैयारियों में हमारी पनडुब्बियों के साथ लगातार होने वाले हादसों के बाद हमारी समुद्री ताकत कमज़ोर होती जा रही है और भविष्य की तैयारियों के लिए बेड़े में शामिल की जाने वाली इन महत्वपूर्ण पनडुब्बियों की जानकारी इस तरह से पूरी दुनिया के सामने आने के बाद हमारी ताकत पर असर पड़ना अवश्यम्भावी है भले ही सरकार कुछ भी कहती रहे. हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि यह जानकारी किस स्तर और किस देश से लीक हुई है पर इसके सार्वजनिक होने से भारत की रक्षा तैयारियों पर बुरा असर अवश्य ही पड़ने वाला है क्योंकि इस पनडुब्बी के माध्यम से हम अपनी समुद्री सामरिक ताकत को बढ़ाने की कोशिशों में लगे हुए है.
                         लीक दस्तावेजों के बारे में बात करते हुए ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार ने जिस तरह से भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के बयानों से असहमति दिखाई है उससे लगता है कि या तो भारत सरकार और रक्षा मंत्री को पूरी बात नहीं बतायी गयी है या फिर वे जानबूझकर इस मामले को हल्का करने की कोशिश कर रहे हैं ? मोदी सरकार के सामने रक्षा मामलों में इस तरह से सेंध लगने का यह पहला मामला है पर सरकार को इससे जिस तरह से निपटना चाहिए था वैसा दिखाई नहीं दे रहा है संभवतः अंदरूनी तौर पर सरकार सब जान चुकी हो पर नौ सेना और देश के मनोबल को बनाये रखने के लिए ही इस तरह की बयानबाज़ी की जा रही हो. ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार ने जिस तरह से संवेदनशील जानकारियां लीक होने के बारे में भी कहा है उससे लगता है कि कहीं न कहीं बड़ी गड़बड़ी अवश्य ही हुई है क्योंकि भारत सरकार के स्वीकार करने या न करने से तथ्य बदलने वाले भी नहीं हैं. हालाँकि इस मामले में संतोष की बात यही है कि पत्रकार की तरफ से यह कहा जा रहा है कि वह ऐसी कोई भी जानकारी सार्वजानिक नहीं करेगा जिससे स्कॉर्पीन की विस्तृत जानकारी मिल सकती हो पर भारत के रक्षा मंत्री के उस दावे को गलत साबित करने के लिए वह उन तथ्यों को छिपाकर कुछ दस्तावेज़ सार्वजानिक करेगा जिससे यह पता चले कि सारी जानकारी लीक हो चुकी है.
                       भारत जिस तरह से आने वाले समय में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के साथ हिन्द महासागर में भी अपनी नौसेना की प्रभावी उपस्थिति चाहता है उसमें यह लीक मामला काफी समस्या पैदा कर सकता है क्योंकि हमारी महत्वपूर्ण जानकारी सार्वजनिक हो जाने के बाद हमारी गतिविधि और मारक क्षमता के बारे में सभी को पता चल जाने वाला है. उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह से पहले से ही चल रही तैयारियों में मोदी सरकार का रवैया रहा करता है तो वह नागरिकों के उत्साहवर्धन के लिए राजनैतिक तौर पर तो ठीक कहा जा सकता है पर उसके बहुत सारे दुष्परिणाम भी होते हैं. अच्छा होता की पूरे मामले की जानकारी सामने आने तक रक्षा मंत्री चुप ही रहते और किसी प्रवक्ता से एक बयान दिलवा कर सरकार का रुख स्पष्ट करवा देते पर अब सरकार और रक्षा मंत्री के दावों को झूठ साबित करने के लिए जो जानकरियां सामने आने वाली हैं उन पर पूरे विश्व की नज़र रहने वाली है और खासकर चीन तथा पाकिस्तान इन जानकारियों को बहुत उत्सुकता से देखने वाले हैं क्योंकि भारत के रक्षा मामलों से जुडी अधिकतम जानकारी आने वाले समय में उन्हें भारत के इन सामरिक उपकरणों से निपटने के लिए मज़बूत आधार भी प्रदान कर सकते हैं.     
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